Monday, January 5, 2009

घट रही है हाथियों की संख्या

हरिद्वार। हाथियों की संख्या को देखते हुये उत्तराखंड को हाथियों का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। सूबे के जंगलों में हाथियों का लिंगानुपात 1:2 का है, जबकि नार्थ ईस्ट के जंगलों में एक नर पर 50 से 80 मादाएं हैं लेकिन राज्य के जंगलों में निरंतर हो रही टस्करों की मौत लिंगानुपात गड़बड़ा सकती है। गत दो वर्ष में विभिन्न वजहों से सोलह टस्कर मौत के मुंह में जा चुके हैं।
वर्ष 2007 में हुई गणना के मुताबिक उत्तराखंड में 1346 हाथी पाए गए थे। राजाजी नेशनल पार्क में 416, कार्बेट नेशनल पार्क में 622, लैंसडौन वन प्रभाग में 180, हरिद्वार वन प्रभाग में 31, देहरादून वन प्रभाग में 27, रामनगर वन प्रभाग में महज एक, तराई सेंट्रल वन प्रभाग में सात, तराई पश्चिम समेत अन्य क्षेत्रों में एक हाथी की मौजूदगी दर्ज की गई। नार्थ ईस्ट के असम, पश्चिम बंगाल और दक्षिण के कई क्षेत्रों में तस्करों की सक्रियता की वजह से लिंगानुपात में काफी अंतर आया है। तस्करों द्वारा नर हाथी को निशाना बनाने से नार्थ ईस्ट में यह अनुपात एक नर के मुकाबले 50 से 80 मादाओं तक जा पहुंचा है। उत्तराखंड इस मामले में बेहतरीन स्थिति में है। इसकी वजह यहा तस्करों की खास सक्रियता का न होना माना जा रहा है। लिंगानुपात में एक आदर्श स्थिति के बावजूद गत दो वर्ष में सोलह टस्करों की मौत चिंता का विषय बनी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि राजाजी नेशनल पार्क में 2007 से 2008 में तीन टस्कर, कार्बेट नेशनल पार्क में पांच, लैंसडौन वन प्रभाग में दो, हरिद्वार में दो, देहरादून, रामनगर, तराई पश्चिम और सेंट्रल में एक-एक कुल सोलह टस्कर प्राकृतिक या अप्राकृतिक मौत के शिकार हो चुके हैं। नर हाथियों की मौत का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो इससे राजाजी और कार्बेट नेशनल पार्क में हाथी के सेक्स रेशियो पर असर पड़ सकता है। वन्य जीव वैज्ञानिक डा. रितेश जोशी भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। राज्य वन्य जीव सलाहकार बोर्ड के सदस्य और वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी के प्रदेश प्रभारी राजेन्द्र अग्रवाल कहते हैं कि एक टस्कर की मौत भी काफी अहमियत रखती है। निश्चित रूप से टस्करों के मौत को लेकर वन महकमे को सचेत होना पड़ेगा। राज्य के मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक श्रीकांत चंदोला ने जागरण से बातचीत में कहा कि टस्करों की मौत के मौजूदा आकड़ों से नर और मादा अनुपात में यकायक बदलाव आने की संभावना नहीं है, लेकिन टस्करों की मौत चिंता का विषय है। इसी के मद्देनजर हरिद्वार में रेस्क्यू सेंटर तैयार किया जा रहा है।

बिजली सप्लाई पर भी असर करेगी बर्फबारी

देहरादून। बर्फबारी के चलते हवा में ठंडक बढ़ना तो लाजिमी है, लेकिन प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर भी इसका असर दिखाई देगा। सूबे में बर्फबारी के चलते हिमालय से निकलने वाली नदियों का जलस्तर तो गिरेगा, लेकिन बारिश से इसकी भरपाई की उम्मीद की जा सकती है। असल समस्या यह है कि बर्फबारी से प्रदेश शीत लहर की चपेट में आने लगा है, जिससे राज्य में बिजली की खपत बढ़ना तय है। उत्तर प्रदेश में यदि जमकर बारिश हुई तो रामगंगा प्रोजेक्ट बंद होने से भी सूबे की दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
मौसम की करवट सूबे की बिजली व्यवस्था पर आगे भी अपना असर दिखा सकती है। पिछले तीन महीने में बढ़ती ठंड से नदियों का जलस्तर गिरा और सूबे का बिजली उत्पादन भी 19 मियू से लुढ़ककर 7 मियू तक पहुंच गया है। हालांकि रामगंगा प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद उत्पादन फिर से 9 व 10 मियू के आसपास लौट आया। पिछले दो-तीन दिनों से ऊंची पहाड़ियों पर बर्फबारी हो रही है। जानकार मानते हैं कि बर्फबारी से नदियों के जलस्तर में आने वाली कमी तो बारिश से पूरी हो जाएगी, लेकिन ठंड बढ़ने से प्रदेश में बिजली की खपत में इजाफा होना तय है। ऐसे में बिजली की डिमांड व सप्लाई के बीच का अंतर भी बढ़ जाएगा। चूंकि रामगंगा प्रोजेक्ट में बिजली का उत्पादन पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में सिंचाई की जरूरत पर टिका है। लिहाजा, यदि उत्तर प्रदेश में ठीक-ठाक बारिश हुई, तो इस प्रोजेक्ट में उत्पादन बंद हो जाएगा। इससे राज्य के बिजली उत्पादन में फिर से करीब तीन मियू की कमी आ जाएगी। ऐसे हालात में ठंड के चलते बढ़ने वाली डिमांड ऊर्जा प्रदेश पर भारी पड़ सकती है। ऊर्जा निगम के निदेशक जेएम लाल बताते हैं कि सर्दियों में किल्लत से निपटने के लिए गर्मियों में की गई 370 मियू की रिजर्व बैंकिंग काम आ रही है। वर्तमान में भी पंजाब, दिल्ली, हरियाणा व गुजरात से बैंकिंग के जरिए बिजली ली जा रही है। इसके अलावा बीएसईएस के साथ हाल ही में हुए एडवांस बैंकिंग एग्रीमेंट से भी प्रदेश को राहत मिलेगी।